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तुम्बाड' में कभी न रुकने वाली बारिश का सच: 4 साल तक सिर्फ मानसून का इंतजार कर मेकर्स ने ऐसे शूट की थी फिल्म

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क्या आपने कभी सोचा है कि फिल्म 'तुम्बाड' देखते वक्त जो नमी, घुटन और लगातार गिरती बारिश आपको महसूस होती है, वह कोई विजुअल इफेक्ट्स (VFX) का खेल नहीं था? निर्देशक राही अनिल बर्वे और अभिनेता-निर्माता सोहम शाह ने इस लोक-कथा को पर्दे पर जीवंत करने के लिए पूरे 4 साल तक सिर्फ असली मानसून का इंतजार किया था। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे जुनून और समर्पण की मिसाल बेहद कम ही देखने को मिलती है।

असली बारिश का जुनून: क्यों ठुकराया गया CGI का रास्ता?

आज के दौर में जब ज्यादातर फिल्में ग्रीन स्क्रीन और CGI (कंप्यूटर-जनरेटेड इमेजरी) के भरोसे बनती हैं, तब 'तुम्बाड' की टीम ने एक अलग ही जिद पकड़ी थी। मेकर्स का मानना था कि सेट पर पानी छिड़कने से वह सीलन, कालापन और डरावना माहौल नहीं आ सकता जो असली मानसून में होता है।

नकली बारिश से हवा में वह नमी और आसमान का वह गहरा सलेटी (grey) रंग कभी हासिल नहीं हो पाता। इसी प्रामाणिकता (authenticity) को पर्दे पर उतारने के लिए मेकर्स ने तय किया कि फिल्म की शूटिंग सिर्फ और सिर्फ कुदरती बारिश में ही की जाएगी, चाहे इसमें कितना भी समय क्यों न लग जाए।

4 साल और 4 मानसून: सब्र की सबसे बड़ी परीक्षा

फिल्म की शूटिंग का शेड्यूल किसी भी आम बॉलीवुड फिल्म जैसा बिल्कुल नहीं था। महाराष्ट्र में मानसून का मौसम सिर्फ 2 से 3 महीने ही टिकता है। मेकर्स हर साल जून-जुलाई में बारिश के शुरू होने का इंतजार करते थे और जैसे ही मानसून खत्म होता, शूटिंग रोक दी जाती थी।

इस तरह फिल्म के बारिश वाले दृश्यों को पूरा करने में लगातार 4 साल का लंबा वक्त लग गया। मुख्य अभिनेता सोहम शाह को इन 4 सालों तक अपना लुक, दाढ़ी, बाल और शारीरिक बनावट बिल्कुल एक जैसी बनाए रखनी पड़ी, जो किसी भी एक्टर के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है।

पानी से खराब होते कैमरे और कुदरती रोशनी की चुनौती

लगातार भारी बारिश में शूटिंग करना पूरी टीम के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। कोंकण और सातार के जंगलों में मूसलाधार बारिश की वजह से महंगे सिनेमैटोग्राफी कैमरे और लेंस बार-बार नमी के कारण खराब हो जाते थे।

फिल्म के सिनेमैटोग्राफर पंकज कुमार को बिना किसी आर्टिफिशियल लाइट के, केवल आसमान की प्राकृतिक रोशनी (Natural overcast light) में शूट करना पड़ता था। कई बार बारिश इतनी तेज होती थी कि पूरी यूनिट को घंटों घने जंगलों में पुराने ढहते हुए बाड़ों के नीचे शरण लेनी पड़ती थी।

कहां है असली 'तुम्बाड' गांव?

फिल्म में दिखाया गया 'तुम्बाड' कोई काल्पनिक नाम नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित एक असली गांव है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस गांव से जुड़ी कई रहस्यमयी और प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं, जहां माना जाता है कि यहां साल के ज्यादातर महीने बेमौसम बारिश होती रहती है।

मेकर्स ने इस गांव के पुराने ढह चुके बाड़ों, काई जमी दीवारों और वीरान रास्तों पर ही शूटिंग की। इसी वजह से फिल्म का हर एक फ्रेम इतना प्रामाणिक और डरावना लगता है।

'तुम्बाड' का यह तरीका सिनेमा के लिए क्यों खास है?

फिल्म की सफलता के पीछे सिर्फ उसकी कहानी नहीं, बल्कि उसे बनाने की प्रक्रिया का यह पागलपन भी शामिल है:

  • शॉर्टकट से परहेज: मेकर्स ने जल्दी में काम खत्म करने के लिए VFX का सहारा नहीं लिया, जिससे फिल्म का फील रियल रहा।
  • धैर्य की मिसाल: 4 साल तक एक ही विजन पर टिके रहना यह साबित करता है कि महान कला समय और त्याग मांगती है।
  • वातावरण बना मुख्य किरदार: लगातार गिरती बारिश सिर्फ बैकग्राउंड नहीं थी, बल्कि कहानी में डर और लालच का माहौल बनाने वाला एक अहम जरिया बनी।

'तुम्बाड' में गिरती बारिश सिर्फ मौसम का मिजाज नहीं थी, वह हस्तर के श्राप और इंसानी लालच की नमी थी। मेकर्स का यही 4 साल का जुनून आज इस फिल्म को भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक कल्ट मास्टरपीस का दर्जा दिलाता है।


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